किसान प्रायः नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश आधारित उर्वरकों का अधिक उपयोग करते हैं, जबकि एक आवश्यक पोषक तत्व सल्फर कई बार उपेक्षित रह जाता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सल्फर की कमी होने पर पौधों की प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे फसलें फफूंद, झुलसा और बैक्टीरियल संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से सल्फर पौधों की कई मूलभूत जैविक प्रक्रियाओं में शामिल रहता है। यह अमीनो अम्ल और प्रोटीन के निर्माण, तेल एवं सुगंधित तत्वों की गुणवत्ता सुधारने तथा प्राकृतिक एंटीबायोटिक जैसे यौगिकों के विकास में भूमिका निभाता है। इसी कारण सल्फर को फसलों की प्राकृतिक सुरक्षा ढाल के रूप में भी देखा जाता है।
विभिन्न फसलों पर सल्फर की भूमिका अलग-अलग रूप में देखी जाती है। केले की फसल में इसकी कमी से पत्तियों में झुलसा, फलों पर धब्बे और भंडारण अवधि में कमी आ सकती है। प्याज और लहसुन में सल्फर तीखापन, गंध और भंडारण क्षमता को प्रभावित करता है, जबकि कमी की स्थिति में कंद खोखले होने और सड़न बढ़ने की संभावना रहती है।
संतरा वर्गीय फलों में सल्फर का पर्याप्त स्तर फलों के रंग और स्वाद को बेहतर बनाए रखने के साथ बैक्टीरियल ब्लाइट जैसे रोगों से बचाव में सहायक माना जाता है। गन्ने की फसल में यह शर्करा प्रतिशत और रस की शुद्धता बढ़ाने के साथ रेड-रॉट जैसे रोगों के विरुद्ध प्रतिरोध क्षमता विकसित करता है। वहीं, सब्जियों में गहरा हरा रंग, मजबूत बनावट और कीट-रोग प्रतिरोध सल्फर की उपलब्धता से जुड़ा होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन परिस्थितियों में सल्फर युक्त उर्वरक का संतुलित उपयोग किया जाना चाहिए। मिट्टी में उपलब्ध सल्फर से पौधों को त्वरित पोषण मिलता है, जिससे उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता स्वाभाविक रूप से सुदृढ़ होती है और फफूंद व बैक्टीरिया का प्रभाव कम हो सकता है।
समग्र रूप से देखा जाए तो सल्फर की सही मात्रा देने से फसलों के उत्पादन, गुणवत्ता और टिकाऊपन में सुधार दर्ज किया गया है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाकर किसान फसलों की सेहत और सुरक्षा दोनों को बेहतर बना सकते हैं।









