सल्फर की कमी से फसलों की रोगों से लड़ने की क्षमता पर असर

कृषि डेस्क | 🗓️ 10 जनवरी 2026
फसलों में सल्फर की कमी के कारण पत्तियों का पीला पड़ना और रोग लक्षण
सल्फर की कमी से प्रभावित फसलों में दिखने वाले सामान्य लक्षण

किसान प्रायः नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश आधारित उर्वरकों का अधिक उपयोग करते हैं, जबकि एक आवश्यक पोषक तत्व सल्फर कई बार उपेक्षित रह जाता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सल्फर की कमी होने पर पौधों की प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे फसलें फफूंद, झुलसा और बैक्टीरियल संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से सल्फर पौधों की कई मूलभूत जैविक प्रक्रियाओं में शामिल रहता है। यह अमीनो अम्ल और प्रोटीन के निर्माण, तेल एवं सुगंधित तत्वों की गुणवत्ता सुधारने तथा प्राकृतिक एंटीबायोटिक जैसे यौगिकों के विकास में भूमिका निभाता है। इसी कारण सल्फर को फसलों की प्राकृतिक सुरक्षा ढाल के रूप में भी देखा जाता है।

विभिन्न फसलों पर सल्फर की भूमिका अलग-अलग रूप में देखी जाती है। केले की फसल में इसकी कमी से पत्तियों में झुलसा, फलों पर धब्बे और भंडारण अवधि में कमी आ सकती है। प्याज और लहसुन में सल्फर तीखापन, गंध और भंडारण क्षमता को प्रभावित करता है, जबकि कमी की स्थिति में कंद खोखले होने और सड़न बढ़ने की संभावना रहती है।

संतरा वर्गीय फलों में सल्फर का पर्याप्त स्तर फलों के रंग और स्वाद को बेहतर बनाए रखने के साथ बैक्टीरियल ब्लाइट जैसे रोगों से बचाव में सहायक माना जाता है। गन्ने की फसल में यह शर्करा प्रतिशत और रस की शुद्धता बढ़ाने के साथ रेड-रॉट जैसे रोगों के विरुद्ध प्रतिरोध क्षमता विकसित करता है। वहीं, सब्जियों में गहरा हरा रंग, मजबूत बनावट और कीट-रोग प्रतिरोध सल्फर की उपलब्धता से जुड़ा होता है।

सल्फर की कमी के संकेतों में नई पत्तियों का हल्का पीला पड़ना, पौधों की वृद्धि रुकना, बार-बार रोग लगना, प्याज-लहसुन में गंध कम होना तथा फलों के रंग और स्वाद में गिरावट शामिल है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन परिस्थितियों में सल्फर युक्त उर्वरक का संतुलित उपयोग किया जाना चाहिए। मिट्टी में उपलब्ध सल्फर से पौधों को त्वरित पोषण मिलता है, जिससे उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता स्वाभाविक रूप से सुदृढ़ होती है और फफूंद व बैक्टीरिया का प्रभाव कम हो सकता है।

समग्र रूप से देखा जाए तो सल्फर की सही मात्रा देने से फसलों के उत्पादन, गुणवत्ता और टिकाऊपन में सुधार दर्ज किया गया है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाकर किसान फसलों की सेहत और सुरक्षा दोनों को बेहतर बना सकते हैं।

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी एवं आधिकारिक वक्तव्यों पर आधारित है।

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