नालंदा यूनिवर्सिटी दीक्षांत समारोह मंच से राष्ट्रपति मुर्मू का संदेश: सिर्फ ज्ञान नहीं, करुणा भी जरूरी
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नालंदा यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में राजगीर, बिहार में छात्रों को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि नालंदा में ज्ञान को कभी अलग-थलग नहीं देखा गया, बल्कि इसे नैतिकता और समाज के कल्याण से जोड़ा गया।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज दुनिया कई जटिल चुनौतियों का सामना कर रही है, ऐसे समय में स्वतंत्र और आलोचनात्मक सोच के साथ करुणा का होना आवश्यक है। उन्होंने छात्रों को ज्ञान के साथ मानवीय मूल्यों को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
राष्ट्रपति मुर्मू ने नालंदा के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि लगभग आठ शताब्दियों तक यह संस्थान एशिया में बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा, जहां विभिन्न देशों से विद्वान अध्ययन और विचार-विमर्श के लिए आते थे।
उन्होंने कहा कि नालंदा का पतन केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक बड़ी क्षति थी। इसके बावजूद, इसकी अवधारणा और बौद्धिक परंपरा जीवित रही और आज इसका पुनरुत्थान उसी विरासत को आधुनिक संदर्भ में पुनः स्थापित करने का प्रयास है।
राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि यह दीक्षांत समारोह केवल एक शैक्षणिक आयोजन नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत संकल्प की पुनर्पुष्टि है, जिसमें ज्ञान, संवाद और शिक्षा को मानवता की सेवा के लिए समर्पित रखने का संदेश निहित है।
प्राचीन नालंदा की विशाल पुस्तकालय का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहां लाखों पांडुलिपियां मौजूद थीं। उसी उच्च स्तर को ध्यान में रखते हुए वर्तमान में विकसित हो रहा संस्थान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी विरासत के रूप में कार्य करेगा।











