17 साल पुराने वन्यजीव अपराध मामले में शाहतोश ट्रेडर दोषी करार, अदालत ने सुनाई सजा

नई दिल्ली | 15 अप्रैल 2026
शाहतोश शॉल जब्ती और वन्यजीव अपराध जांच से जुड़ा प्रतीकात्मक दृश्य
शाहतोश शॉल तस्करी मामले में जब्त सामग्री और जांच प्रक्रिया का प्रतीकात्मक दृश्य

भारत में वन्यजीव कानून प्रवर्तन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में नई दिल्ली की अदालत ने जयपुर स्थित एक आर्ट गैलरी मालिक को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के उल्लंघन का दोषी ठहराया है। आरोपी पर लुप्तप्राय तिब्बती मृग, जिसे चिरू के नाम से जाना जाता है, के बालों से बने शाहतोश शॉल के अवैध निर्यात का प्रयास करने का आरोप था।

राउज़ एवेन्यू जिला न्यायालय के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 12 मार्च 2026 को यह फैसला सुनाया। यह मामला दिसंबर 2008 में सामने आया था और लगभग 17 वर्षों तक चला। अदालत ने आरोपी सैयद शाहिद अहमद काशानी को दोषी पाते हुए विभिन्न धाराओं के तहत सजा सुनाई।

तिब्बती मृग अनुसूची-I में सूचीबद्ध प्रजाति है, जिसका व्यापार भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित है। साथ ही CITES (Convention on International Trade in Endangered Species) के तहत भी 1975 से शाहतोश शॉल का अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रतिबंधित है।

अदालत ने आरोपी को धारा 49बी(1)/51(1ए) के तहत 3 वर्ष की सजा और 50,000 रुपये जुर्माना, साथ ही अन्य धाराओं में अतिरिक्त कारावास दिया।

इस मामले की विशेषता विभिन्न एजेंसियों के बीच लंबे समय तक चले समन्वय में रही। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB), केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI), सीमा शुल्क विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने मिलकर जांच और अभियोजन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

जांच के दौरान इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर निर्यात खेप में 1,290 शॉल संदिग्ध पाए गए। फोरेंसिक जांच में 41 शॉल में तिब्बती मृग के बालों की पुष्टि हुई। यह पहली बार था जब किसी वन्यजीव अपराध मामले में सीबीआई के माध्यम से मुकदमा चलाया गया।

अदालत में आरोपी ने दावा किया कि उसने केवल मशीन निर्मित पश्मीना खरीदी थी और किसी अवैध गतिविधि में शामिल नहीं था। हालांकि, अदालत ने प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर इन दावों को खारिज कर दिया और दोष सिद्ध माना।

जांच में शामिल अधिकारियों और वैज्ञानिकों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना गया। जब्त शॉल अब सरकारी संपत्ति घोषित किए गए हैं। यह मामला भारत में वन्यजीव अपराधों के खिलाफ समन्वित जांच और साक्ष्य-आधारित कार्रवाई की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

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